Poetry
Kuch Aksa Rait Par
by Sushil Bhatia
"एक राह अकेली सी एक अकेला मुसाफिर कुछ क़दमों के निशाँ... कुछ अक्स रेत पर।" हर एक इंसान का माज़ी और उससे जुड़ी यादें उसकी बाकी की जिन्दगी के हमसफ़र होते हैं। सुशील भाटिया द्वारा रचित ‘कुछ अक्स रेत पर’ ऐसी ही कुछ नज़्मों का एक गुलदस्ता है जिसमें ज़िन्दगी के हर प्रकार के अक्स देखे जा सकते हैं। उनकी रचनाओं में कहीं एक टीस व् तेज़ दर्द का अहसास है, तो कहीं पर स्वछन्द बहती नदी की कल-कल का आभास। इनकी कविताओं में बहुत ही सरल भाषा में उजागर होती भावनाएं स्वतः ही मन में घर कर जाती हैं और यही सरलता कवि सुशील की रचनाओं को सराहनीय बना देती है। ‘मन का आँगन बुहारते’ में जहां उन्होंने बहुत कोमलता से बिखरी हुई यादों को समेटने की कोशिश की है, वहीं ‘आओ, एक प्याला चाय पियें’ कविता में वे अपनी छोटी उम्र में चली गयी बिटिया का गहन दुःख दर्शाते हुए आज के समाज में गिरते पड़ते, छिन्न-भिन्न होते रिश्तों पर कटाक्ष करने से नहीं चूके हैं। परन्तु समय को किसी के माज़ी से क्या। समय अपनी गति से चलता जाता है। वास्तव में, समय ही तो माज़ी का निर्माता है जो चलते चलते छोड़ जाता है...कुछ अक्स रेत पर।
